नई दिल्ली: देश के सबसे चर्चित और रसूखदार कारोबारी परिवारों में से एक, रॉबर्ट वाड्रा (Robert Vadra) की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। गुरुग्राम के शिकोहपुर जमीन सौदा (Land Deal) से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) के एक बेहद संवेदनशील मामले में वाड्रा को देश की देश की सबसे बड़ी अदालतों में से एक, दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) से अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। दरअसल, निचली अदालत (Trial Court) द्वारा जारी किए गए समन (Summons) के खिलाफ रॉबर्ट वाड्रा (Robert Vadra) ने जो राहत की गुहार लगाई थी, उसे उन्होंने वापस ले लिया है। कानूनी गलियारों में इसे वाड्रा के लिए एक बहुत बड़ा रक्षात्मक कदम और केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) यानी ईडी (ED) की एक बड़ी रणनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।
इस पूरे कानूनी घमासान की पृष्ठभूमि को समझें तो दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने बीते 14 मई को ही वाड्रा को कोई भी अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया था। अदालत ने निचली अदालत (Trial Court) के उस आदेश पर रोक लगाने की मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया था, जिसके तहत वाड्रा को कोर्ट में पेश होने को कहा गया था। सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी ईडी (ED) की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील जोहेब हुसैन ने अदालत के सामने एक बेहद चौंकाने वाला दावा किया। उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि रॉबर्ट वाड्रा (Robert Vadra) ने निचली अदालत के समन को चुनौती देने वाली अपनी इस मुख्य याचिका में कई भ्रामक और झूठी दलीलें (False Arguments) पेश की हैं। ईडी (ED) के इस तीखे और सबूतों से लैस वार के बाद अदालत का रुख भी कड़ा हो गया।
जांच एजेंसी के दावों की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय (High Court) ने रॉबर्ट वाड्रा को इस पूरे मामले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने और लिखित स्पष्टीकरण देने का एक कड़ा निर्देश जारी कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने साफ कर दिया कि उन्हें राहत नहीं मिलेगी और उन्हें हर हाल में 16 मई को राऊज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) के समक्ष प्रत्यक्ष रूप से पेश होना ही होगा। इस न्यायिक कड़े रुख और जांच एजेंसी के आक्रामक तेवरों को भांपते हुए वाड्रा के कानूनी सलाहकारों ने याचिका को आगे बढ़ाना सही नहीं समझा, जिसके बाद आखिरकार आज इस याचिका को पूरी तरह से वापस ले लिया गया।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच वाड्रा के लिए राहत की बस एक ही बात रही कि इस मामले की सुनवाई कर रही राऊज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) ने बीते 16 मई को उन्हें सशर्त जमानत (Bail) दे दी। लेकिन, इस जमानत का मतलब यह कतई नहीं है कि वह आरोपों से मुक्त हो गए हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब उन्हें जेल की सलाखों के पीछे जाए बिना, एक नियमित आरोपित (Accused) के रूप में निचली अदालत (Trial Court) के भीतर चल रहे मुकदमे का सामना करना होगा और हर तारीख पर अपनी हाजिरी लगानी होगी।
इस पूरे विवाद की जड़ें आज से करीब 18 साल पुरानी हैं। साल 2008 में हरियाणा के गुरुग्राम के अंतर्गत आने वाले शिकोहपुर इलाके में साढ़े तीन एकड़ जमीन का एक ऐसा सौदा (Land Deal) हुआ, जिसने आगे चलकर देश की राजनीति और कॉर्पोरेट जगत में एक बहुत बड़ा तूफान खड़ा कर दिया। जांच दस्तावेजों के मुताबिक, रॉबर्ट वाड्रा (Robert Vadra) की मालिकाना हक वाली कंपनी 'मेसर्स स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड' ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज नाम की एक कंपनी से यह कीमती जमीन महज 7.5 करोड़ रुपये की मामूली कीमत पर खरीद ली। वाड्रा इस स्काई लाइट कंपनी में मुख्य डायरेक्टर के पद पर आसीन थे।
इस पूरे सौदे में सबसे हैरान करने वाली बात जो सामने आई, वह थी कागजी कार्रवाई की रफ्तार। महज 24 घंटे के भीतर ही इस पूरी जमीन का मालिकाना हक वाड्रा की कंपनी के नाम पर ट्रांसफर कर दिया गया। इसके बाद खेल और बड़ा हो गया। साल 2012 आते-आते स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी ने इसी साढ़े तीन एकड़ जमीन को देश की दिग्गज रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ (DLF) को पूरे 58 करोड़ रुपये की भारी-भरकम रकम में बेच दिया। मात्र कुछ ही सालों के भीतर बिना किसी बड़े निर्माण या विकास कार्य के, कंपनी को करोड़ों रुपये का अप्रत्याशित और संदेहास्पद मुनाफा हुआ। इस संदेहास्पद और बेहद तेज मुनाफे को लेकर साल 2018 में एक औपचारिक प्रथम सूचना रिपोर्ट यानी एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, जिसके बाद वित्तीय अनियमितताओं की जांच करने वाली एजेंसी ईडी (ED) ने इस मामले की कमान अपने हाथों में ले ली।
लंबी और बेहद बारीकी से की गई जांच के बाद, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पिछले साल 17 जुलाई 2025 को रॉबर्ट वाड्रा (Robert Vadra) और उनके करीबियों के खिलाफ अदालत में एक विस्तृत चार्जशीट (Chargesheet) दाखिल की थी। इस चार्जशीट में वाड्रा के अलावा 10 अन्य लोगों और उनकी मुखौटा कंपनियों को नामजद किया गया था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने 4 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसके बाद 15 अप्रैल को राऊज एवेन्यू कोर्ट ने ईडी (ED) की इस चार्जशीट का संज्ञान (Cognizance) लेते हुए सभी को समन जारी करने का हुक्म सुनाया।
अदालत ने इन सभी आरोपितों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) रोकथाम कानून (PMLA) की बेहद सख्त धारा 3 और धारा 4 के तहत दर्ज आरोपों को प्रथम दृष्टया सही पाया। जिन अन्य प्रमुख लोगों और कंपनियों को कोर्ट ने समन (Summons) भेजा है, उनमें, सत्यानंद याजी, केवल सिंह विर्क, मेसर्स स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी प्राईवेट लिमिटेड, मेसर्स स्काई लाइट रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड, मेसर्स स्काई लाइट रियल अर्थ इस्टेट्स प्राईवेट लिमिटेड, मेसर्स ब्लू ब्रीज ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड, मेसर्स आर्टेक्स, मेसर्स नॉर्थ इंडिया आईटी पार्क्स प्राइवेट लिमिटेड, मेसर्स लंबोदर आर्ड एंटरप्राइजेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, मेसर्स एसजीवाई प्रोपर्टीज प्राईवेट लिमिटेड शामिल हैं।
वित्तीय जांच एजेंसी ईडी (ED) इस मामले में अब तक बहुत बड़ी और दंडात्मक कार्रवाई को अंजाम दे चुकी है। जांच के दौरान अवैध कमाई और मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) के पुख्ता सबूत मिलने का दावा करते हुए, ईडी ने रॉबर्ट वाड्रा (Robert Vadra) और उनकी मुख्य कंपनी की करीब 37.64 करोड़ रुपये की अनुमानित कीमत वाली 43 अचल संपत्तियों को पहले ही पूरी तरह से कुर्क (Attach) यानी जब्त कर लिया है।
हालांकि, रॉबर्ट वाड्रा (Robert Vadra) और उनके वकीलों का खेमा शुरू से ही इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है। अदालत में दलील देते हुए वाड्रा के कानूनी प्रतिनिधियों ने कहा था कि उनके मुवक्किल के खिलाफ धन शोधन या मनी लॉन्ड्रिंग का कोई भी वास्तविक मामला बनता ही नहीं है और राजनीतिक द्वेष के चलते उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उनके वकीलों ने कोर्ट से ईडी की चार्जशीट पर संज्ञान न लेने की अपील भी की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। बहरहाल, हाई कोर्ट से याचिका वापस होने के बाद अब वाड्रा के पास कानून की शरण में सीधे ट्रायल का सामना करने के अलावा कोई दूसरा शॉर्टकट रास्ता नहीं बचा है।
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